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जब गीता चंद्रन चित्तौड़ पहली बार आई

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on 26/04/2012 | 9:13:00 am

चित्तौड़गढ़  
अब तक के अनुभव से यही जाना है क़ि शुद्ध शास्त्रीय नृत्य आदि में तमाम रचनाएं-भाव-अभिनय ईश्वर-आध्यात्म जैसे विषय से जुडा होता है जो कई मर्तबा आसानी से समझने में नहीं पाता.मगर खासकर स्कूल-कोलेजों में राष्ट्रीयता आदि से ओतप्रोत रचनाएं बहुत सराही जाती है.आसान और सुगम कवितायेँ नृत्य के ज़रिए दर्शकों के मानस पर अच्छा और गहरा असर छोड़ती है.भले देश में कई शात्रीय नृत्य,घराने और शैलियाँ रहे हो मगर सभी का सामूहिक प्रयास हमारी इस साझी संस्कृति को प्रचारित-प्रसारित करते हुए देश को थामे रखना रहा है.

ये विचार देश की प्रखर समाजसेविका,शिक्षाविद,विदुषी,नृत्यांगना और शिक्षाविद पद्मश्री गीता चंद्रन ने सैनिक स्कूल,चित्तौड़ में स्पिक मैके कार्यक्रम के दौरान कहे.विश्व नृत्य दिवस के आयोजनों के क्रम में समपन्न इस प्रस्तुति विद्यार्थियों की मनरूस्थिति का भान करते हुए पुष्पांजली से आरम्भ अपने नृत्य में वंदेमातरम जैसी सशक्त रचना पर अभिनय कर राष्ट्रीयता के भाव जगाए.बहुत अनुशाषित सभागार में दर्शकों ने सत्तर मिनट तक लगातार गीता चंद्रन के ज़रिये हमारे देश की गौरवमयी संस्कृति को जाना.साहित्य के क्षेत्र की महान कवयित्री मीरा की धरती पर म्हाने चाखर राखो जी जैसी रचना पर दर्शकों ने अपने ही मीरा को दुगुने उत्साह से फिर जाना.  

शुरुआत में कलाकारों का स्वागत-दीप प्रज्ज्वलन स्कूल प्राचार्य ग्रुप कप्तान डी.सी.सिकरोडिया ,रजिस्ट्रार मेजर अजय ढ़ील,स्पिक मैके समन्वयक जे.पी.भटनागर,विरष्ठ कवि और समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने किया.इस अवसर पर गीता चंद्रन पर केडेट अशोक यादव द्वारा बनाया एक परिचयात्मक पावर पॉइंट प्रदर्शन भी दिखाया गया.कलाकार परिचय केडेट अश्विनी ने दिया.तमिलनाडु के इस प्राचीन नृत्य में हमेशा की तरह उपयोग लिए गए वाध्य यन्त्र भी दक्षिण भारतीय थे.संगकार की भूमिका में नटूवंगम वादक एस.शंकरन,गायक वी.वेंकटेश्वर,मृदंगम वादक जी.सूर्यनारायण,बांसुरी वादक रजत कुमार और शिष्या नृत्यांगना स्नेहा चक्रधर शामिल हुए.

पूरी ऊर्जा और प्रभा के साथ गीता चंद्रन ने प्रस्तुति के बीच-बीच में विद्यार्थियों से बातचीत के ज़रिये अपने अनुभव-प्रश्नोत्तर आदि किये.देश के भूगोल का परिचय देते हुए हमारे सभी नृत्यों,संगीत घरानों का परिचय देते हुए उनमें आपसी अंतर भी बताया.उन्होंने कहा नृत्य कि शिक्षा लेने का सही समय सात साल की उम्र से है.जब हमारा शारीरिक गठन आकार लेने लगता है.नृत्य की अपनी वर्णमाला और बारहखड़ी होती है जहां और चीजों की तरह ही सीखने के लिए मेहनत,अनुशासन,पक्का इरादा बहुत ज़रूरी होता है.

आखि़री में गीता चंद्रन ने स्नेह चक्रधर के ज़रिये मुद्राओं का प्रदर्शन किया.ताल और वाध्य का ज्ञान कराया.एक अच्छे व्याख्यान-प्रदर्शन के रूप में हुए इस कार्यक्रम में दर्शकों की पसंद पर भगवान् शिव पर आधारित रचना हर हर महादेव का सम्पूर्ण और शुद्ध नृत्य के साथ अभिनय किया गया.समापन देव स्तुति वनमाली वासुदेव के साथ हुआ.प्रतीक चिन्ह देते हुए आभार स्कूल प्राचार्य ग्रुप कप्तान डी.सी.सिकरोडिया ने दिया.कार्यक्रम में डॉ. नरेन्द्र गुप्ता,डॉ.रेणु व्यास,डॉ. कनक जैन, एम्.एल.डाकोत, बी.डी.कुमावत, बी.एन.कुमार, कुंतल तोषनीवाल, नन्द किशोर निर्झर, अब्दुल ज़ब्बार, वी.बी.व्यास, बेंक प्रबंधक रवि भटनागर, नवनीत करण सहित नगर के मीडियाकर्मी और चार सौ विद्यार्थियों ने शिरकत की.
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Our Founder Dr. Kiran Seth

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