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सरकारें नहीं जागी तो लुप्त हो जाएगा शास्त्रीय संगीत-डॉ. वर्षा अग्रवाल

Written By Manik Chittorgarh on 31/08/2012 | 7:20:00 am



  • प्राथमिक शिक्षा में हो शास्त्रीय संगीत 
  • बातचीत संतूर वादक डॉ. वर्षा अग्रवाल ने कहा
  • भास्कर न्यूज चित्तौडग़ढ़ 

शास्त्रीय संगीत भारतीय संस्कृति की जान है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को इसे बचाने के लिए आगे आना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा में ही शास्त्रीय संगीत को अनिवार्य किया जाए। वर्ना शास्त्रीय संगीत लुप्त हो जाएगा। फिर कैसे पैदा होंगे पद्मश्री पं. भजन सोपोरी, पं. रविशंकर, भीमसेन जोशी और बिस्मिल्लाह खां जैसे कलाकार।

यह पीड़ा है देश की प्रमुख संतूर वादक डॉ.वर्षा अग्रवाल की। इन दिनों स्पिक मैके के माध्यम से जिले में स्कूली बच्चों को संतूर वादन की बारीकियां समझा रही अग्रवाल गुरुवार को सर्किट हाऊस में पत्रकारों से बातचीत कर रही थी।

सूफीयाना घराने से देश की पहली महिला संतूर वादक डॉ.वर्षा राजस्थान की बेटी की है। झालावाड़ में जन्मी वर्षा को कला विदुषी, राष्ट्रीय सम्मान, सम्राट विक्रमादित्य सम्मान, रिसर्च लिंक अवार्ड मिल चुके हैं, लेकिन राजस्थान सरकार की ओर से अब तक किसी प्रकार का कोई सम्मान नहीं मिला। एमपी सरकार ने भी उनको सम्मानित किया है। वर्षा ने छह साल की उम्र में गायन एवं तबला की शिक्षा लेने के बाद आठ साल की उम्र में संतूर की शिक्षा उज्जैन में पंडित ललित महंत एवं इसके बाद पद्मश्री भजन सोपोरी से ली।

वर्षा अग्रवाल के अब तक छह एलबम साउंड स्लीप, एनर्जी, प्लीजेंट मूड, वॉक टू गैदर विथ संतूर, मॉर्निंग मैलोडी एवं ईवनिंग मैलोडी बने हैं। उनका कहना है कि शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए उनका चैनलों पर सही समय पर प्रसारण भी जरूरी है। डॉ.वर्षा मप्र के उज्जैन शासकीय कन्या स्नातकोत्तर उत्कृष्ट कॉलेज में संगीत विभाग में प्रोफेसर हैं। वह यूरोप एवं अरब देशों में प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। डॉ.वर्षा आधुनिक संतूर बजाती है। यह पं. भजन सोपोरी ने तैयार किया। इसमें 112 तार हैं। उन्होंने बताया कि संतूर का प्राचीन नाम सत तंत्री वीणा है। संतूर कश्मीर का प्रतिनिधि वाद्ययंत्र है।

विदेशों में गाय, पौधों को सुनाया जाता है संगीत: महंत 

संतूर वादक डॉ.वर्षा अग्रवाल के गुरु पंडित ललित महंत ने बताया कि स्विट्जरलैंड में गायों एवं आयरलैंड में पौधों को शास्त्रीय संगीत सुनाया जाता है। इसी के परिणाम स्वरूप वहां पर गायों की दूध देने क्षमता में वृद्धि एवं पौधे पर्यावरण को संतुलित बनाने में अधिक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। फिर भारत में हमारे ही संगीत को सिखाने की ओर सरकारें क्यों कदम नहीं बढ़ा रही है। भारतीय संगीत को विदेशों में बहुत तवज्जो मिल रही है, जबकि भारत में नहीं। यह चिंतनीय विषय है।
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