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मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के पचास साल/कौशल किशोर

Written By Manik Chittorgarh on 2 अक्तू॰ 2014 | 8:44:00 am

कविता और समय

‘अंधंरे में’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है। इस रचना के पचास साल पूरे हो रहे हैं। यह कविता परम अभिव्यक्ति की खोज में जिस तरह की फैंटेसी बुनती है तथा इसमें जिस तरह की बहुस्तरीयता व संकेतों में विविधता है, इसे लेकर हिन्दी के विद्वान आलोचकों ने इसकी अलग अलग व्याख्या की है। यहां तक कि प्रगतिशील आलोचकों के मतों में भी भिन्नता रही है। वैसे इस कविता की चाहे जो भी व्याख्या की गई हो, लेकिन अपने मूल में यह कविता ऐसे अंधेरे की पड़ताल करती है जो देश की आजादी के बाद की व्यवस्था का अंधेरा है, इस लोकतंत्र का अंधेरा है। ‘अंधेरे में’ पूंजी की दुनिया व रक्तपाई वर्ग द्वारा पैदा की गई क्रूर, अमानवीय व शोषण की हाहाकारी स्थितियों से साक्षात्कार करती है। यह हिन्दी कविता में ‘मील का पत्थर’ है जिसमें ‘अंधेरा’ मिथ नहीं, ऐसा यथार्थ है जिससे जूझते हुए हिन्दी कविता आगे बढ़ी है।

शमशेर की प्रसिद्ध कविता है: ‘काल तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू - तुझमें अपराजित मैं वास करूँ‘‘। अपराजित का यह भाव काल से गुत्थम गुत्था होने या एक कठिन संघर्ष में शामिल होने से पैदा होता है। जहां समय अपने को रचता है, वहीं कविता समय को रचती है। यह कविता और समय के बीच का द्वन्द्वात्मक रिश्ता है। इस प्रक्रिया में कई बार कविता समय को लांघ जाती है और वर्तमान से ज्यादा भविष्य की कविता बन जाती है। काल का अतिक्रमण कालजयी रचना के साथ होता है। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ ऐसी ही रचना है जो कल की ही नहीं बल्कि यह हमारे आज की कविता है। यह कितना अचरज भरा है कि जिस कविता के जटिल अर्थ विन्यास, फैंटेसी, अपारदर्शी शिल्प आदि को लेकर भिन्न भिन्न विचार व मत प्रकट किये गये, यहां तक कि अबूझ व अभेद्य कविता तक कहा गया, उसने कविता की नई पीढ़ी को सर्वाधिक प्रेरित किया है। इस पीढ़ी ने इसके साथ सबसे ज्यादा आत्मीय व साथीपन का जुड़ाव महसूस किया है। 

हम यहां मुक्तिबोध की इस कविता के कुछ मूल सूत्रों को पकड़ते हुए आज के समय व समाज के अंधेरे को समझने की कोशिश करेंगे। ये कुछ सूत्र हैं: ‘वर्तमान समाज नहीं चल नहीं सकता’, ‘पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’, ‘देश मर गया, अरे जीवित रह गये तुम’, ‘सब चुप, साहित्यिक चुप, और कविजन निर्वाक.... मात्र किंवदन्ति’, ‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होगंे/ तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सभी’, ‘मिल सके मुझे/मेरी वह खोई हुई/परम अभिव्यक्ति अनिवार/आत्म सम्भवा !’ 

‘अंधेरे में’ की रचना का वह दौर था जब आजादी के बाद नेहरू सरकार मिश्रित अर्थव्यवस्था व लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ आई। इस सरकार द्वारा जनता को बड़े बड़े सब्जबाग दिखाये गये। भ्रमों की रचना हुई। मध्यवर्ग, बौद्धिक समाज व साहित्य की दुनिया के लिए सम्मोहन पैदा किया गया। गौरतलब है कि  ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ देश की जनता ने शानदार संघर्ष किया लेकिन देश की यह स्वतंत्रता साम्राज्यवादियों से संबंध विच्छेद पर आधारित न होकर समझौते के तहत मिली थी। देश के विकास का नेहरू मॉडल भले ही अपने रूप में लोकलुभावनापूर्ण दिख रहा हो परन्तु इसके परदे के पार्श्व में पूंजी की व्यवस्था थी। यह ऐसी व्यवस्था थी जो देश के विकास के लिए साम्राज्ववादी पूंजी पर निर्भर थी। इसके द्वारा दमघोंटू अंधेरा रचा जा रहा था। मुक्तिबोध इसमें बेचैन कर देने वाले यर्थाथ का दर्शन करते हैं। ‘अंधेरे में’ इसी यथार्थ की रचना है और जिसमें मुक्तिबोध अपनी ‘खोई हुई परम अभिव्यक्ति’ को पाने के निमित्त मनुष्य के मन.मस्तिष्क से लेकर समाज को जकड़ने वाली पूंजी की  व्यवस्था द्वारा पैदा किये अंधेरे में, अंधेरे से गुत्थम गुत्था हैं। 

मुक्तिबोध की कविता जिस अंधेरे से रू ब रू है, वह इन पचास सालों में सच्चाई बनकर उभरा है। उसका विस्तार ही नहीं हुआ, वह सघन भी हुआ है। मुक्तिबोध ने मठ व गढ़ को तोड़ने की बात की है। इसलिए कि उन्होंने इन मठों व गढ़ों को बनते और इनके अन्दर पनपते खतरनाक भविष्य को देखा। कैसे हैं ये मठ व गढ़ ? आज ये पूंजी, धर्म, वर्ण, जाति के मठ व गढ में रूपांतरित हो गये है। राजनीति सेवा नहीं, मेवा पाने का माध्यम बन गई है। बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं। प्रगति व विकास के दावे किये जा रहे हैं। कोई गौरवान्वित हो सकता है कि हमारी संसद अरबपतियों से रौशन है। पर हमने ईमानदारी, नैतिकता, आदर्श, भाईचारा सहित जो जीवन मूल्य निर्मित किये थे, उसमें कहां तक प्रगति की है ? अब तो इस पर बात करना भी पिछड़ापन है। 

गोरख पाण्डेय का मशहूर गीत है, ‘पैसे का गीत’ - ‘पैसे की बांहें हजार, अजी पैसे की। पैसे की महिमा अपरम्पार, अजी पैसे की।’ जब पैसा इतना गुणी हैं तो इसे   पाने के लिए सब कुछ किया जा सकता है। वहीं, पैसे द्वारा क्या नहीं हासिल हो सकता है। मंत्री, संत्री व सरकार की क्या कहें, खुफिया व जांच संस्थाओं को ‘तोता’ बनाया जा सकता है, पैसे के बल पर वे वही बोलेंगी जो उन्हें रटाया गया। यह जो चमक है जिसे ‘शाइनिंग इंडिया’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, यह इसी पैसे की चमक है। यह आवारा व बदचलन पूंजी है। इसने सबका चरित्र बदल दिया है, समाज, राजनीति, जीवन, संस्कृति, अर्थनीति। मनुष्य की सोच, विचार, संस्कृति सब बदल रही है। जिन चीजों के लिए मनुष्य को शर्म व ग्लानि महसूस होती थी, आज  वह गौरव की बात है। कवि बलराज पाण्डेय कहते है ‘लोग शर्माना भूल गये हैं’। कवि राजेश जोशी कहते हैं: ‘अब तो इस गोल-मटोल और ढलुआ पृथ्वी पर/किसी एक जगह पाँव टिका कर खड़े रहना भी मुमकिन नहीं/फिसल रही है हर चीज अपनी जगह से/कौन कहाँ तक फिसल कर जाएगा/,किस रसातल तक जाएगी यह फिसलन/कोई नहीं कह सकता/हमारे समय का एक ही सच है/कि हर चीज फिसल रही है अपनी जगह से ।’

‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध कहते हैं ‘पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’। गांधी जी पूंजीपतियों को देश का ट्रस्टी मानते थे। उनका दर्शन ‘हृदय परिवर्तन’ पर आधारित था। उनकी समझ थी कि समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों तथा वर्चस्ववादी जातियों व शक्तियों के हृदय परिवर्तन से समाज में समता आयेगी। गांधी जी के इन विचारों के विपरीत मुक्तिबोध का चिंतन था। वे इस ‘उजली दुनिया’ के पीछे फैले काले संसार को, इसकी हृदयहीनता व मनुष्य विरोधी चरित्र को बखूबी समझते थे जिसकी प्रवृति छलना व लूटना है। पूंजीवाद की यह अमानवीयता आज के समय में कही ज्यादा आक्रामक होकर हमारे सामने आई है। आज जिस ‘महान लोकतंत्र’ की दुहाई दी जा रही है, वह मूलतः लूट और झूठ की बुनियाद पर टिका है। यह अपनी लूट को छिपाने तथा उसे बदस्तूर जारी रखने के लिए झूठ की रचना करता है। जैसे आज सरकार की नीतियों के केन्द्र में कॉरपोरेट हित सर्वोपरि है लेकिन इसे समावेशी कहा जा रहा है। इसी तरह सरकार के सहयोग से कॉरपोरेट पूंजी द्वारा हमारे देश की प्राकृतिक संपदा, खनिज, जंगल, जल व जमीन की लूट जारी है। लेकिन इसे ‘विकास’ की संज्ञा दी जा रही है। 

आज यदि पूंजी एक तरफ अतिरिक्त मूल्य या मुनाफा पैदा कर रही है, तो वहीं वह दरिद्रता का भी उत्पादन कर रही है। यही कारण है  कि इस कथित ‘शाइनिंग इंडिया’ के पीछे विशाल ‘अंधेरा भारत’ है जहां बड़ी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीने के लिए अभिशप्त है। श्रमिक जनता अपने श्रम से निर्वासित है, उसके मूल्य से वंचित है। किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। दलित, अल्प संख्यक व कमजोर वर्ग के लोग मारे व सताए जा रहे हैं। हालत तो ऐसी है कि यदि आप जरा भी संवेदनशील हैं तो शर्मसार हुए बिना नहीं रह सकते। हमारी ढ़ाई साल, पाच साल की बच्चियां भी सुरक्षित नहीं है। रोज रोज घट रही नृशंस बलात्कार की खबरों से अखबार भरा पड़ा है। लगता है जैसे छोटी बच्चियों से लेकर पूरा स्त्री समुदाय यौन क्रीड़ा की वस्तु व हिंसक आनन्द प्राप्ति के साधन में तब्दील हो गया है। 

निश्चय ही यह हमारे समाज के संकट का सूचक है। यह संकट सांस्कृतिक भी है। जो देश के कर्ताधर्ता व नीतियों के निर्माता हैं, वे ही इस अंधेरे के रचनाकार हैं। इन्होंने जो बाजार निर्मित किया है, वह सब कुछ अपने अनुकूल ढ़ाल रहा है। मनुष्य व समाज से लेकर कला व साहित्य सब इनकी टकसाल में ढ़ल रहा है। अपनी कविता ‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध द्वारा मध्य वर्ग व बौद्धिको पर की गई टिपणियां गौरतलब है। वे कहते हैं: ‘मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम’, ‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक......उनके खयाल से यह सब गप है/मात्र किंवदन्ती/रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध ये सब लोग’, ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास/किराये के विचारों का उद्भास’। देश की आजादी के बाद मध्य वर्ग के मन में इस आजादी के प्रति नया आकर्षण व सम्मोहन था। बौद्धिको, कलाकारों में अवसर का लाभ उठाने की होड़ थी। इस प्रक्रिया ने उन्हें रक्तपाई वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध कर क्रीतदास की स्थिति में पहुचा दिया। 

यहां मुक्तिबोध की बौद्धिकों पर टिप्पणी काफी आलोचनात्मक व तीखी है। वे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान स्थापित आदर्शों व सिद्धान्तों का पतन देखते हैं। घटनाएं तेजी से घटती हैं और मुक्तिबोध को उद्विग्न करती हैं। विचारणीय है कि वह क्या बात है जिसकी वजह से मुक्तिबोध बार बार कविता से बाहर आते हैं और ‘अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे’ की बात करते हैं। यह साठ के दशक का परिदृश्य था। इससे आज के परिदृश्य की तुलना की जाय, तो यह उस वक्त से कही ज्यादा आज की सच्चाई है। आज तो अभिव्यक्ति पर लगातार हमले हो रहे हैं। ऐसे में साहित्यकारों. संस्कृतिकर्मियों से जोखिम व खतरे  उठाने, साहित्य को मशाल बनाने तथा उनसे साहस की अपेक्षा की जा रही है। लेकिन आज हमारे हिन्दी साहित्य व रचनाकारों की हालत क्या है ? यहां तो ‘रचना करो, संग्रह छपवाओ, जुगत.तिकड़म भिड़ाओ और पुरस्कार लो’ जैसी प्रवृति हावी है। यदि साहित्य का उद्देश्य इतना सीमित हो जाएगा, तो साहित्य का समाज से कट जाना लाजमी है। तभी तो मैनेजर पाण्डेय जैसे आलोचक को कहना पड़ रहा है ‘कवि पुरस्कृत हो रहे हैं, कविता बहिष्कृत हो रही है।’ 

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